Sunday, March 24, 2013

समर्पण


दिन-भर की थकन से,
जब लौटते हो घर,
और, भर लेते हो बाँहों में,
मुझे, अपनी पनाहों में।
उस पसीने की खुशबू से,
महकती हूँ मैं।
तुम्हारा, तर-बतर भींगा बदन,
आगोश में, न जाने क्यों,
दमकती हूँ मैं।

यह पूनम की रात,
और तुम्हारा स्पर्श।
माथे पर चाँद,
और, आँखों में हर्ष।
स्वप्नों की बाती,
और, जुगनू के दिये,
दोनों मदहोश,
तो क्योंकर, कुछ पिए।

मेरे कपोलों पर,
तुमहारें अधरों का निशान।
माथे पर चमकती,
वह सिन्दूर की शान।
जो देती है, मेरे,
अस्तित्व को पहचान।
यह होली-दिवाली,
तुम्हीं से तो है।
यह रस्मों की लाली,
तुम्हीं से तो है।
स्वप्नों के देवता तुम,
और मैं, तुम्हारी दर्पण।
यह अरुणिमा, यह मधुरिमा,
सर्वस्व, तूम पर अर्पण।
कुछ ऐसा है -
मेरा- तुम्हारा समर्पण...........

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