प्रिय
! तुम्हारी आँखों के,
इन अश्रु की सौगंध मुझे,
इन अश्रु की सौगंध मुझे,
रोक
नहीं, अब पाएगा,
इस
जीवन का, तट-बंध मुझे।
हो
प्रेम, हमारा इस जग में,
या
पार, अलौकिक उस जग में।
उस
परम पिता, परमेश्वर को,
एक
विश्व नया, रचना होगा।
फिर
नील गगन अपना होगा।
तुम
मेरी प्राण-सुधा सुभगे,
मैं
अमृत, तुम्हरे अधरों का।
हम
दोनों के इस जीवन पर,
अधिकार
नहीं, इन बधिरों का।
जो
इस समाज के ज्ञाता हैं,
और
रस्मों के निर्माता हैं।
अंगारों
पर, चलकर ही,
हमें
कुन्दन, बन तपना होगा।
फिर
नील गगन अपना होगा।
इस
पथ पर, चाहे मृत्यु हो,
या
तम से, घिरा हुआ जीवन।
अब
जीवन की परवाह किसे,
सर्वस्व
किया, तुझको अर्पण।
जब
शव, दोनों के निकलेंगे,
आजाद
परिंदे, हम होंगे।
हर
धड़कन, प्रीतम झूमेगी,
तब
पूरा यह सपना होगा,
फिर
नील गगन अपना होगा।
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