Sunday, March 10, 2013

वो कहते हैं कि बदल रहा हूँ मैं

वो कहते हैं, कि, बदल रहा हूँ मैं।
फिर क्यों, सुपुर्दे-खाक में भी, जल रहा हूँ मैं।

सच सुनाने का सिला, लोगो ने यूं दिया,
क्यों, व्यर्थ के सवाल पर, उबल रहा हूँ मैं।

आज मेरे साये से भी, कतराते हैं वो,
दामने जिनका सितारा, कल रहा हूँ मैं।

बदनसीबी ने मुझे, मुकर्रर कर दिया,
कभी हसीन लम्हों का, गजल रहा हूँ मैं।

सियासतों की जंग ने, कुछ इस कदर लूटा मुझे,
कि वक्त के मरहम तले, सम्भल रहा हूँ मैं।

सुना है कि मौत भी, महबूब जैसी है,
इसी तजुर्बे के लिए, मचल रहा हूँ मैं।

No comments:

Post a Comment