Wednesday, March 13, 2013

विरह- व्यथा

सप्तवेणी, इस धरा पर,
शरद का, यह चंद्रमा,
स्वर्ण, नूतन रश्मियों से,
रात को सजाता है।
और मेरा, उर पिपासु,
दृग में भरकर प्रेम आँसू,
अश्रु- जल बहाता है।

क्यों वह ऊष्मा न रही,
हम दोनों के संबंध में,
उस प्रीत के सौगंध में,
युग वहीं ठहर गया,
खामोश हीं गुजर गया।
वक्त के जिस मोड़ पर,
संबंध सारे तोड़ कर,
हम जहाँ अलग हुए,
आज भी उस मोड़ से,
अतीत के उस छोर से,
कोई मुझे, बुलाता है।
अश्रु- जल बहाता है।

यह कैसा अंतर्द्वंद है,
गंगा का, अपने नीर से,
इस रूह का, शरीर से।
पुछती है, हर घड़ी,
निस्तब्धता की वेदना,
और यह, व्यथित हृदय,
नैराश्य में, डूबा हुआ,
क्षीण और ऊबा हुआ,
स्मृति के मुहाने पर,
अनायास, चला जाता है।
अश्रु- जल बहाता है।  

1 comment:

  1. Amazing amazing amazing... U always take.me.to a.different world.. The trust in ur beautiful writing always remains as.strong as ever

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