आज उसके काँपते हुए,
हाथ इशारा करते है.
वह भी कभी जवान था.
फौलाद- सा इंसान था.
उसकी लम्बी- झुकी काया,
जिनमें अतीत की है छाया.
जो थी कभी, इतनी कड़ी,
धुप , वर्षा, आँधियों में,
भी रही , तनकर खड़ी.
बताती हैं कि, उसने भी,
बहा दिया , अपना लहू,
अगली पीढ़ी की ख़ुशी में,
अपने बच्चों की हँसी में.
तब घर में उसका राज था,
क्योंकि उसका हीं साम्राज्य था.
परिवार उसकी भेड़ें थी,
जो सदैव , उसे घेरे थी.
आज जब जर्जर बुढ़ापा,
इस कदर कुछ छाया है.
मानो इस गड़ेरिये की,
साख मिटाने आया है.
अब भी वही भेड़ें है,
मगर कोई अब न घेरे है.
सबसे अलग वह है खड़ा,
अपनी हीं, जिद पर है अड़ा.
जिद है , उसकी आन की,
अपने हीं, आत्म-सम्मान की,
जो उसका , अधिकार है.
मगर किस बल- बूते,
पर , वह , यह ले,
क्योंकि वह निराधार है.
अब तो बस वे आंखें हैं,
गहरी,चोटिल,धूमिल आंखें,
जो विवशता से भरी हैं,
आगंतुकों से दया की,
भीख लेने को खड़ी हैं.
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