जब डूबती है शाम , और भींगती है रात,
जब चाँदनी से धुलती, है सारी कायनात,
कैसे बताऊं तुम्हें मैं , मजबूर ये हालात,
बेचैन मेरी सांसें ,और अनगिनत जज्बात.
यह सच है कि तुमसे , मैं कह नहीं पाया,
समंदर की तरह कभी मैं , बह नहीं पाया,
आवारगी ने जब मुझे , बदनाम कर दिया,
क्या करूँ खामोश, तब मैं, रह नहीं पाया.
यूँ तो अकेले मंजिलों की , राह चल सकता हूँ मैं,
मुश्किलों के दौर में , गिरकर संभल सकता हूँ मैं,
न जाने तुम्हें देखकर ,क्यों ऐसा लगता है मुझे,
तुम जो दे दो साथ तो, दुनिया बदल सकता हूँ मैं.
अधूरी मेरी रूह और , अधूरी हैं बाहें,
अश्क पीते-पीते,थक गयी हैं निगाहें,
मर्द होकर रोता है, कहने लगेंगे लोग,
इसीलिए ख़ामोशियों में ,भरता हूँ आहें.......
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