स्वर्ण - सेज पर सोने वाले , देता हूँ मै आज निमंत्रण,
नग्न -भग्न और रुग्न वह काया, करती है तेरा आमंत्रण.
जाकर देख कि क्यों कहीं कोई, पेट बाँध कर सोता है,
सूखे स्तन से चिपका , वहीँ बच्चा भूखा रोता है.
जाकर देखो उस निकेत में, जहाँ प्रकाश का दीप नहीं,
पेट की आग बुझाने में, बुझ गया वही कुलदीप कहीं.
जाकर देख कि आँख का मोती, कब सागर-सा बनता है,
बाप के कंधे पर हीं जब कहीं , बेटे का शव जलता है.
जाकर देख की वीभत्सना, कैसे तांडव बन जाती है,
विवशता की आँधी में, जब लज्जा नंगी हो जाती है.
इतना सामर्थ्य कहाँ है तुझमें, जो तुम उनको देख सकोगे,
मेरी कविता को पढ़कर हीं , क्या वहाँ आँखें रोक सकोगे?
No comments:
Post a Comment