किए थे उसने भी,
अनेकों व्रत-उपवास.
ह्रदय- पटल पर बसी थी,
बस एक वर की आश.
वर हो उसके जैसे राम,
प्रेम-रुपी ईश्वर-धाम.
मगर मिला, ऐसा पति,
रोज होती थी सती.
यही उसका भाग्य था,
सौभाग्य हीं दुर्भाग्य था -
क्योंकि वह सीता नहीं थी.
छोड़ दी गई वह फिर,
घने निर्जन ,अन्धकार में,
विभत्सना के फर्श पर,
वासना की धार में.
वहाँ न था कोई रावण,
जो देता, सोचने का कुछ क्षण.
चाँदनी नहा रही थी,
लज्जा बिखरी जा रही थी.
सिर झुकाए मौन थी वह,
क्या बताए कौन थी वह -
क्योंकि वह सीता नहीं थी.
इधर -उधर, कितने पहर,
न जाने क्यों भटकती रही.
वह अभागिन आत्मा की,
बोझ से दबती रही.
शायद दुआ हीं असर लाए,
कोई वाल्मीकि, नज़र आए.
मगर वह, ऐसी अकिंचन,
विफल होता, जिसका रुदन.
सामने था, जहाँ सारा,
मिलता उसे , कैसे सहारा -
क्योंकि वह सीता नहीं थी.
असह्य हो गई थी पीड़ा,
मुख से निकलती थी हाय.
वसुंधरा ! मुझे गोद में लो,
मूर्छित गिरी, बाँहें फैलाए.
मगर धरती, इतनी निर्मम,
क्या समझती, अबला का गम.
क्यों उसे , गले लगाती,
अपने सीने में छुपाती -
क्योंकि वह सीता नहीं थी.
आँगन से समाज तक,
धर्म से , रिवाज तक.
कितनी सहन करती उपेक्षा,
फिर दिया अग्नि-परीक्षा.
मगर , वह तो जल गई,
आंसुओं के संग हीं,
अतीत में , बदल गई.
कैसे बच पाती भला वह -
क्योंकि वह सीता नहीं थी.......
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