Thursday, February 16, 2012

एहसास




उम्र सत्रह पार कर ली,
तुमने इंटर पास कर ली,
यह पढाई छोड़ दो अब,
काम कोई खोज लो अब.
उस दिन पिताजी ने बुलाया,
विवश नेत्रों में बताया,
देखते हो घर की हालत,
कर्ज में डूबा है हर रत.

गाँव में तो कुछ नहीं है,
बाढ़, सुखा सब यहीं है.
तुम शहर की ओर देखो,
कुछ नगर के दाँव सीखो.
पिताजी कहते चले गए,
भाव में बहते चले गए.
सर झुकाए मौन था मैं,
कुछ न सुझा, कौन था मैं.

फिर मुझे माँ ने बुलाया,
आँखों से आँसू उतर आया.
क्या करें ,हम खुद हैं बेबस,
भाग्य पर न किसी का वश.
इस उम्र में सब खेलते हैं,
हँसी-ख़ुशी से डोलते हैं.
भगवन! ये क्या दिखाया तुने,
छाती लगाकर लगी रोने.

मैंने उसके आँसू पोंछे,
लाल थे, जो रक्त- भीचे.
जो हुआ, वह सब सही है,
आज न तो , कल यही है.
समझा- बुझाकर बाहर आया,
बाहर बहन को रोता पाया.
ख़ुशी , जिसकी नूर थी वह,
आज दुःख से, चूर थी वह.

अगले हीं दिन ,चल पड़ा घर से,
अपने शहर, अपने नगर से,
दूर अपनों की नज़र से,
स्नेह , ममता के असर से.
बढ़ चला , एक नयी डगर में,
घोर, निर्जन समंदर में ,
संघर्ष रुपी इस सफ़र में,
प्रौढ़ता के नए पहर में.

बचपन में ,लोगों का था कहना,
यह पुत्र है,इस घर का गहना.
एक दिन यही शिखर चढ़ेगा,
धन-धान्य से घर को भरेगा.
कितने पिताजी खुश हुए थे,
स्वप्न में खोये हुए थे.
माँ भी कितनी खुश हुई थी,
बात जब मेरी हुई थी.

एक दिन बड़ा अफसर बनूँगा,
मुट्ठी से, पैसे गिनूँगा.
मेरी इच्क्षा भी खड़ी थी,
बस प्रतीक्षा , की घडी थी.
पर आज मैं यह जान पाया,
मध्य - वर्गी की ये काया,
नीचे जमीं, ऊपर गगन है,
बस यही अपना चमन है.

कैसे बुझाऊँ ,धन की प्यास,
कैसे करूँ , इसका प्रयास,
बन गया जो, किसी की आश,
करता रहा, यही एहसास.......





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