तू जो भी है-
मुझमें समाता भी तो नहीं।
करूँ लाख कोशिशें,
मगर तू हैं कि मुझसे,
दूर, जाता भी तो नहीं।
मैं एक कतरा –
कैसे समझूँ तुझे,
जो बहता है, आँखों से,
शबनम की तरह,
कभी मेरे होठों से,
सरगम की तरह।
कुछ कहता है, मुझसे,
फिर लड़ता है, मुझसे।
छुपाता है, खुद को,
मेरे ही दामन में।
उलझता है, मुझसे,
मेरे ही, आँगन में।
इतने पर भी, मुझे,
अपना बनाता भी तो नहीं।
कैसे अलग कर दूँ,
तू सताता भी तो नहीं।
तू हवा है, फिजाँ है,
या अधूरी ख़्वाहिश।
तू सागर है, साहिल है,
या, हल्की-सी बारिश।
जो दिलाता है एहसास –
मुझे अपने होने का,
भरी महफिल में भी,
तन्हाँ होकर, रोने का।
टूटते हुए तारों में,
सपने सँजोने का।
कब तक रहेगा गुमसुम,
कुछ बताता भी तो नहीं।
तू मेरा ही है हिस्सा,
यह जताता भी तो नहीं।
तू खुदा की है नेमत,
या मेरा ही वजूद।
नहीं खबर मुझे,
मगर, यकीं है -
तू जो भी है, जैसा भी,
तू मेरा है।
सिर्फ मेरा.........................
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