Saturday, January 12, 2013

वह प्यार कहाँ से लाऊँ मैं

तुम सृष्टि का सर्वस्व प्रिय,
और मैं, इस जग का अनुयायी।
तुम नभ तक उज्ज्वल, प्रखर सूर्य,
मैं अपने हित का सौदायी।
फिर तुम्हें समाहित करने-सा, विस्तार कहाँ से लाऊँ मैं।
तुम्ही कहो इस जीवन में, वह प्यार कहाँ से लाऊँ मैं।

कनक लता-सी कोमल तुम,
रजनी तुम पर इतराती है।
उषा, तुमहारें कदमों पर,
नित रश्मि-रूप में आती है।
फिर इन्द्र-धनुषी रंगों-सा श्रिंगार कहाँ से लाऊँ मैं।
तुम्ही कहो इस जीवन में, वह प्यार कहाँ से लाऊँ मैं।

यह विश्व समूचा, प्रेम रूप,
चहूँओर तेरे, मतवालें हैं।
जिन अधरों की तुम स्वामी हो,
वे जीवन- रस के प्यालें हैं।
इन अधरों से रस पाने का, अधिकार कहाँ से लाऊँ मैं।
तुम्ही कहो इस जीवन में, वह प्यार कहाँ से लाऊँ मैं।

इस जग की तुम नहीं प्रिय,
तुम प्राण-सुधा, गंगा-जल हो,
घनघोर तपस्या से सिंचित,
किसी भागीरथ, का फल हो।
मूढ़, अधम मैं, धरती पर, व्यवहार कहाँ से लाऊँ मैं।
तुम्ही कहो इस जीवन में, वह प्यार कहाँ से लाऊँ मैं।

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