जब आसमां , जमीं पर आकर, झुकने लगे,
मुकद्दर भी , अपनी बाजुओं में टूटने लगे,
ऐ दोस्त!तेरी जिंदगी में, अब भी क्या कमी है?
तब लोग आकर मुझसे, यह पूछने लगे.
क्या बताता मैं उन्हें , सब कुछ यहाँ परायी है,
हर सिकंदर की तरह, मेरे पास भी तन्हाई है,
चंद साँसों को जिन्हें,अपना समझ बैठा था मैं,
जिंदगी भी, मौत से , उधार मांग लाई है.
कैसे बताऊँ मैं उन्हें , कि कैसे गुजरा यह सफ़र,
इक सहारे के लिए , तरसता रहा हूँ उम्र-भर,
बाजुओं के दम पर मैंने , जीत रक्खा था जहां,
फिर भी नमी छायी रही, सदैव मेरी आँखों पर.......
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