Sunday, November 11, 2012

आम आदमी

कभी-कभी सोचता हूँ-
उठा लूँ आसमान, अपने सिर पर,
बदल डालूँ, इस समाज को,
झूठे, रस्मों-रिवाज को।
लगा दूँ, अपना जीवन,
गरीबों की, सेवा के लिए,
किसी प्रताड़ित, बेवा के लिए।
झोंक दूँ, खुद को-
आक्रोश की, भट्ठी में,
बाँध लूँ, इस दुनिया को,
अपनी इस, मुट्ठी में।

मगर यह आग-
मेरे अंदर ही, दब जाता है।
नसों और धमनियों में,
उबलता रक्त, जम जाता है।
हृदय का स्पंदन -
साँसों तक, पहुँच नहीं पाता।
और मैं विवश -
कभी-कुछ, कर नहीं पाता।
शायद इसलिए -
क्योंकि मैं एक आम आदमी हूँ ...........

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