Sunday, July 1, 2012

फिर से जिन्दा कर दो

मेरी शुभे -
अब पलकों पर, स्वप्न नहीं रुकते,
न साँसों में, जोशे-जुनूँ, जगती है।
क्या कहूँ ! किस कदर टूटा हूँ,
हवा के झोंकें से भी, चोट लगती है।
वो पहली बारिश, गुदगुदाती नहीं,
चाँदनी रातें अब, सुहाती नहीं।
खलाओं में, जिंदगी गुजरती है,
ख़ुशी भी, पास आने से, डरती है।

यह तीरगी मुझे अब, जला देगी,
खामोशियों में, एक दिन, सुला देगी, 
जानता हूँ, कुछ नहीं कर पाऊँगा,
रह-गुजर में खुद हीं, बिखर जाऊँगा।
यहाँ मेरी आत्मा, मुझसे जलेगी,
विरह की यह शाम, कभी न ढलेगी,
कब तलक अटके रहेंगे, प्राण मेरे,
बिन तुम्हारें, मौत भी, मुझे न मिलेगी।

सौगंध है तुम्हें, हमारे प्रीत की,
अश्क में डूबे हुए, इस गीत की,
फिर से मेरी जिंदगी को, इक सफ़र दो,
स्नेह-निर्झर बाँहों का, वह समंदर दो,
फिर से मेरी साँसों में, संगीत भर दो,
लौट आओ ! मुझे फिर से जिन्दा कर दो.............


(कठिन शब्दों के अर्थ: खलाओं- शुन्य, तीरगी- अँधेरा , )

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2 comments:

  1. Good one,continue writing.............

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  2. Nice thought to make this composition, but now a days it's not happening frequently in speeding youth.

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