Sunday, January 8, 2012

कैसा यह जहान है?

ऐ खुदा ! तू ही बता, तेरा कैसा यह जहान है?
तुने बनाया था जिसे, क्या आज वही इंसान है?

एक दी सबको लहू, और एक जैसी आत्मा,
फिर क्यों किसी के नाम में,सरदार,सिंहऔर खान है.

जिन्हें फरिश्ता जानकर, हम उनके पीछे हो लिए,
अब उन्हीं पैरों तले , कुचलती अपनी जान है.

देखता हूँ जिंदगी भर, लोग मरते हैं यहाँ,
यह जानकर कि वे भी,कुछ दिनों के मेहमान है.

हँसी तो उनपर आती है, जो रोज मौत देते है,
क्योकि वे अभी तक ,अपने मौत से अंजान है.

रौशनी इतनी जो की, कुछ भी दिखाई न दिया,
यह रौशनी भी कुछ नहीं,अंधेरे के समान है.

चंद सिक्कों के लिए , इंसान कितना गिर गया,
मैं तो क्या,तुम्हें भी, अब इसका कहाँ अनुमान है.

तेरे ही जहान से ,कितनो की दुनिया, छिनकर,
मंच से कहते हैं फिर, हमारा भी ईमान है.      

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