Saturday, February 9, 2013

नारी उत्पीड़न


नारी –
चीखती है, चिल्लाती है।
उसकी करुण आवाज भी,
बड़ी दूर, तक जाती है।
बस एक पुकार, और आँसू ,
हजारों की आँखों में,
दया, उमड़ आती है।
 
मगर, बेचारा पुरुष –
वह तो ठीक से,
कभी रो-भी नहीं पाता।
बेचैनियों की बाँहों में,
जागता है, रात भर,
मगर शुकुन, की चादर में,
सो भी नहीं पाता।

और जब उठता है, सुबह में,
तो देखता है, भीड़,
लिए हुये, कुछ झंडे,
कुछ झंडे और एजेंडे,
जहाँ, लिखा है, उसका दोष –
नारी उत्पीड़न...............

Saturday, January 19, 2013

लावारिस

कहाँ उन्हें पता था-
कि खींच ली जाएगी,
रूह तक, इस जिस्म से,
कि कफन भी, उन्हें न मिलेगी,
खुद में, सिमटने के लिए,
कि दफन, हो जाएँगे,
वे भी, किसी अखबार में,
किसी लावारिस की तरह......

क्योंकि -
जुर्म जो किया था -
उन्होने इस समाज से,
खिलाफत, जो करने की,
रिवाजों, से लड़ने की।
कसम ली थी, दोनों ने,
संग जीने-मरने की............