Saturday, May 26, 2012

कश्मे-कश


कश्मे-कश में हूँ , तुम्हें सुनाऊँ भी तो कैसे ,
जख्म जो दिल पर लगे, दिखाऊँ भी तो कैसे ?

कहाँ तुम चंचल नदी , और मैं वीरान सागर,
तुम मेरे स्वप्नों की आभा , और मैं यायावर,
फिर हसीन ख्वाब मैं , सजाऊँ  भी तो कैसे ,
इस आग -पानी को भला , मिलाऊँ भी तो कैसे?

वह हवा जो रोज , मेरे कमरे में आती है,
तुम्हारें बदन को छूकर , मुझसे लिपट जाती है .
उस महक को  , दामन से मिटाऊँ भी तो कैसे ,
तन्हाइयों की रात यह, बिताऊँ भी तो कैसे ?

तुम कली हो , हुस्न की दुनिया दीवानी है,
हर किसी को यहाँ , किस्मत आजमानी है,
इस भीड़ में फिर, अपना हक़ जताऊँ भी तो कैसे ,
जो है मेरी आँखों में, बताऊँ भी तो कैसे ?

कभी जो देखता हूँ मैं , तुम्हें गैरों की बाहों में,
शूल -सी चुभ उठती है कुछ, मेरी इन निगाहों में,
तुम ही कहो चुप-चाप फिर रह पाऊँ भी तो कैसे,
दर्द की यह दास्ताँ , कह पाऊँ भी तो कैसे?

इक निराशा , इस ह्रदय को चीर देती है,
हर राँझे  से दूर , उसकी हीर होती है,
फिर ख़याल आता है, मर जाऊँ  भी तो कैसे,
बदनाम अपनी उल्फत को, कर जाऊँ भी तो कैसे........?

Sunday, April 22, 2012

कहाँ जाना चाहते हो?


रोज सफलता के किस्से,
भर गए , जीवन के हिस्से,
मगर न कोई, हमसफ़र है,
कैसा निर्जन ,यह सफ़र है.
रात की नींदों को त्यागे,
किसलिए तुम जागते हो?
कहाँ जाना चाहते हो?

न पिता की छत्र-छाया,
न बहन का स्नेह पाया,
माँ की ममता से भी वंचित,
न प्रेम -रस से हुए सिंचित.
किन सुखों को पाने हेतु,
इन सबों को त्यागते हो?
कहाँ जाना चाहते हो?

जब भी दुआ में हाथ उठाया,
दौलत हीं दौलत माँग लाया.
रोक दे मुझको , उठाना,
मगर,रोक न उसको गिराना,
स्वप्न में भी,तुम खुदा से,
क्या यही बस मांगते हो?
कहाँ जाना चाहते हो?

अर्थ का रंगी ज़माना,
हर ख़ुशी के दाम पाना.
तुमने सीखा है, यहाँ पर,
 एहसान कर, इतना बताकर.
अपनी हीं छाया के तले से,
क्यों सदा तुम भागते हो?
कहाँ जाना चाहते हो?